मेरा शरारती बचपन ( कविता )

क्या दौर था वो बचपन का 
खुद रोने और मां को परेशान करने का ,
मां मुझे लोरी सुनाती 
और थपकी देकर मुझे सुलाती ,
ज्यों ज्यों मैं बड़ा होता गया 
बढ़ने लगी शैतानी ,
खेल खेल में बच्चों की
मार कुटाई करता गया ,
घर पर मेरी शिकायतें आती थीं ,
मां मुझे समझाती थीं ,
लेकिन मैं था शैतान ,
कहां मानने वाला था ,
अपनी आदत स्वरूप 
चलने वाला था ,
इन्हीं आदतों के वश 
एक लड़की का सिर फोड़ दिया ,
मेरी शैतानियों से तंग आकर ,
माता पिता दोनों ने पीटा ,
दंडस्वरूप स्कूल में दाखिला करा दिया ,
लेकिन मैं अपनी आदतों से 
बाज फिर भी न आया ,
एक पटाखा जलाकर 
मैम की कुर्सी के नीचे फेंक दिया ,
मेरी हरकतों से परेशान होकर 
मैम ने एक कम्बल टांगों में जमा दिया ,
जैसे जैसे समय का चक्र चलता गया ,
अच्छे बच्चों और अच्छे अध्यापकों के 
संपर्क में आकर सुधर गया ,
क्या दौर था वो बचपन का 
खुद रोने और मां को परेशान करने का ।।

अर्थ ----
       कम्बल = बेंत ( एक मीटर का डंडा )

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