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कशिश और अनाइसा का प्रेम पत्र ( 8 )

अनाइसा द्वारा कशिश के पत्र का प्रत्युत्तर ************************************ मेरे सनम मेरी जान ,         बहुत शैतान हो तुम । पत्र इस तरह फेंका कि सीधे - सीधे मेरे पैरों के पास आकर गिरा । वो तो ठीक था कि मैंने शीघ्रतापूर्वक उठाकर छुपा लिया । अगर पत्र पर भैया की दृष्टि पड़ जाती तो , हो जाता उसी समय अपनी प्रेम कहानी का बंटाधार । शैतान कहीं के ! उल्टी सीधी शरारतें तो बहुत आती हैं तुम्हें । सच बताऊँ तो , मैं तुम्हारी इन्हीं शरारतों पर मर मिटी हूँ । तुम्हारे बिन जीना ' जल बिन मछली ' सा लगने लगा है । सारी रात इधर से उधर , उधर से इधर करवटें बदलती रहती हूँ और जब तुम्हें अपने सम्मुख न पाती हूँ तो छटपटाकर रह जाती हूँ । कभी - कभी तो लगता है कि हम दोनों कदाचित एक दूसरे के लिये ही बने हैं और जन्म जन्मांतर के जीवनसाथी हैं ।           रही अब मिलने की बात तो मैं भी तुमसे मिलना चाहती हूँ लेकिन संकोचवश कह न सकी । जो दशा तुम्हारी है वही मेरी भी है । इसलिये तुम मंगलवार की प्रात: 4:30 बजे वैशाली उद्यान के पास जो झील है वहीं पर आकर मिलो । हम दोनों वहीं पर अपने - ...

कशिश और अनाइसा का प्रेम पत्र ( 4 )

------- अनाइसा द्वारा लिखा गया पत्र ------ कशिश जी ,            मैं सदैव आपका सहयोग करती रहूँगी , पर आप मेरी उतनी ही प्रशंसा किया करें जितनी की मैं अधिकारी हूँ ।  आपसे अनुरोध है कि आप मुझे प्रशंसा के भँवरजाल में इतना मत फंसाओ कि मैं स्वयं को ही भूल जाऊँ , कदाचित मैं अभी इतनी प्रशंसा के लायक नहीं हूँ जितनी की आप कर रहे हैं । अभी तो सिर्फ साधारण लड़की और आपकी कक्षामित्र मात्र हूँ । पत्र पढ़कर अच्छा लगा प्रत्युत्तर लिखने के लिये धन्यवाद ।                                           -------- अनाइसा ©️®️ प्रेम कुमार लविश

कशिश और अनाइसा का प्रेम पत्र ( 3 )

------ कशिश द्वारा लिखा गया पत्र ------- अनाइसा जी ,         सामाजिक विज्ञान का कार्य पूर्ण करने के बाद नोट कॉपी सधन्यवाद लौटा रहा हूँ । आपने मुसीबत के समय में मेरा सहयोग किया , इस सहयोग के लिये हमेशा आपका कृतज्ञ रहूँगा । आप बहुत अच्छी और हर दृष्टि से प्रशंसा की पात्र हो । मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ जो आपका सहयोग प्राप्त हुआ ।                 मुझे उम्मीद है , आगे भी आपका सहयोग इसी प्रकार प्राप्त होता रहेगा ।                                    ------ कशिश ©️®️ प्रेम कुमार लविश

कशिश और अनाइसा का प्रेम पत्र ( 2 )

-------- अनाइसा द्वारा लिखा गया पत्र -------- कशिश जी ,        मेरी नोट कॉपी अब आपके हाथों में है , जितनी जल्दी हो सके आप कॉपी करके लौटा दें । वरना सामाजिक विज्ञान वाली मैम नोट कॉपी के न होने पर मुझे बहुत कूटेंगी । आपने मेरी नोट कॉपी और लेखन शैली को सुंदर बताकर जो प्रशंसा की है उसने मेरा हौंसला बढ़ाया है । इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।                                              ---- अनाइसा ©️®️ प्रेम कुमार लविश

कशिश और अनाइसा का प्रेम पत्र ( 1 )

--------- कशिश द्वारा लिखा गया पत्र ---------- अनाइसा जी ,        मेरी सामाजिक विज्ञान की नोट कॉपी नहीं मिल रही है , हो सकता है किसी ने मध्यावकाश में चुरा ली हो । अब मुझे फिर से नोट कॉपी बनानी पड़ेगी । चूंकि आपके नोट और लेखन शैली बहुत सुंदर है , इसलिए आपसे अनुरोध है कि अपनी नोट कॉपी 3 दिन के लिए देने की कृपा करें । काम होते ही आपकी नोट कॉपी लौटा दूँगा ।          कृप्या उत्तर अवश्य दें ।                                           ---- कशिश ©️®️  प्रेम कुमार लविश

शायरी 2

मैं   अपना   इश्क़   उसको   दिखा   नहीं  सकता , चाहकर   भी   पास   उसको  बुला  नहीं   सकता , कब्ज़ा कर लिया है उसने कुछ इस कदर दिल पर , लाख़ भुलाना  चाहूँ  तो उसको भुला नहीं सकता । बुलाता   हूँ  जब  कभी   नाज़  के  साथ , चली  आती   हो  मेरी  आवाज़ के साथ , महक उठता है ज़र्रा ज़र्रा मेरे गुलशन का , गाती हो तराने जब किसी साज़ के साथ । छत पर तेरे साथ  पतंग से पतंग लड़ाने को  जी चाहता है , बार - बार  तेरी  मोहिनी सूरत  निहारने  को जी चाहता है , बदनाम होकर न रह जाये हमारी मोहब्बत गली कूचों में , मांग में सिंदूर भरकर तुझे अपना बनाने को जी चाहता है । फोन पर ही बात करती रहोगी या मिलने भी आओगी , घर पर मम्मी हैं पापा हैं ऐसे बहाने कब तक बनाओगी , अगर आ गया किसी दिन ससुर जी से मिलने के बहाने , देखकर उई अम्मा कहते हुए कमरे में अवश्य  छुप जाओगी । प्रेम कुमार मौर्य ... ✍️

काम क्या है ?

.      धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष मानव जीवन के वो मूल तत्व हैं , जिनमें से अगर किसी भी तत्व को मानव विस्मृत कर दे तो उसका जीवन सफल नहीं माना जा सकता , न ही उसको सुख समृद्धि प्राप्त हो सकती है और न ही उसको मोक्ष प्राप्त हो सकता है । ऐसा मैंने मानव जीवन का सार कही जाने वाली पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता में पढ़ा है ।       अब आता हूँ मैं अपने उस विषय पर जिसके बारे में मैं आपके समक्ष बहुत दिनों से अपने विचार रखना चाहता था , लेकिन अंतर्द्वंद्व के चलते अब तक नहीं कह सका था । आज थोड़ा साहस जुटाकर वो बात आपके समक्ष रख रहा हूँ ।        मैं अपने विचार उस " काम " के बारे में रख रहा हूँ जिसके कारण मानव की उत्पत्ति हुई है । जिसको हमारा समाज हेय दृष्टि से देखता है और जिसके बारे में कभी बात ही नहीं करना चाहता । अगर कोई स्त्री , पुरुष इस विषय पर बात करता भी है तो उसको " कामी पुरुष या कामी स्त्री " की संज्ञा दे दी जाती है । जबकि ऐसा नहीं करना चाहिये ।       काम वो तत्व है जिससे प्रेम , मोह , आकर्षण , कामुकता आदि जन्म लेती है । जिसके बिना धर्म ,...