काम क्या है ?

.      धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष मानव जीवन के वो मूल तत्व हैं , जिनमें से अगर किसी भी तत्व को मानव विस्मृत कर दे तो उसका जीवन सफल नहीं माना जा सकता , न ही उसको सुख समृद्धि प्राप्त हो सकती है और न ही उसको मोक्ष प्राप्त हो सकता है । ऐसा मैंने मानव जीवन का सार कही जाने वाली पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता में पढ़ा है ।

      अब आता हूँ मैं अपने उस विषय पर जिसके बारे में मैं आपके समक्ष बहुत दिनों से अपने विचार रखना चाहता था , लेकिन अंतर्द्वंद्व के चलते अब तक नहीं कह सका था । आज थोड़ा साहस जुटाकर वो बात आपके समक्ष रख रहा हूँ ।

       मैं अपने विचार उस " काम " के बारे में रख रहा हूँ जिसके कारण मानव की उत्पत्ति हुई है । जिसको हमारा समाज हेय दृष्टि से देखता है और जिसके बारे में कभी बात ही नहीं करना चाहता । अगर कोई स्त्री , पुरुष इस विषय पर बात करता भी है तो उसको " कामी पुरुष या कामी स्त्री " की संज्ञा दे दी जाती है । जबकि ऐसा नहीं करना चाहिये ।

      काम वो तत्व है जिससे प्रेम , मोह , आकर्षण , कामुकता आदि जन्म लेती है । जिसके बिना धर्म , अर्थ और मोक्ष की कल्पना भी नहीं की जा सकती । क्योंकि काम ही एक ऐसा अकेला तत्व है जिसकी वजह से ये सृष्टि चलायमान है । इसी की वजह से ही इस सृष्टि में भिन्न भिन्न प्रकार के रंग बिखरे हुए हैं । अगर काम के साथ साथ धर्म की शिक्षा दे दी जाये तो कोई भी प्राणी कर्म पथ के मार्ग से नहीं भटक सकता ।

       दुःख है तो मात्र इस बात का कि समाज और हमारे माता पिता सब कुछ जानते हुए भी हमें " काम शिक्षा " से वंचित रखते हैं और न ही इस विषय पर कभी चर्चा करना चाहते हैं । लेकिन इसके दोषी मैं माता पिता की अपेक्षा धर्म के कलयुगी ठेकेदार साधु संत , पुजारी , महात्माओं और पंडितों को अधिक मानता हूँ क्योंकि इन्होंने ही काम के प्रति पुस्तकों में और अपने विचारों के द्वारा लोगों के मन मस्तिष्क में विष को अधिक भरा है । यहाँ तक कि काम की चर्चा करने वाले व्यक्ति को ये लोग पापी तक कह देते हैं । अगर " काम " पाप है तो हम सब पाप के फल हैं । जबकि ये भली भांति जानते हैं कि काम के बिना न तो सृष्टि चल सकती है और न ही दांपत्य जीवन सुखमय हो सकता है ।

        प्रकृति द्वारा उपहार स्वरूप दिये गये काम का जितना अधिक प्रतिरोधों द्वारा दमन किया जायेगा , ये उतना ही अधिक विकराल रूप धारण करेगा । क्योंकि दमन की हुई चीज किसी न किसी रूप में कभी न कभी दोगुनी शक्ति के साथ विस्फो ट अवश्य करती है । इसलिये मेरा कहना तो यही है कि किसी प्राकृतिक तत्व का दमन करने की अपेक्षा उस तत्व के बारे में अच्छी बुरी जानकारी प्राप्त करके जागरूक हो जाना चाहिये ताकि उससे बचा या लाभान्वित हुआ जा सके । अगर काम से बचना हो या इसका आनंद लेना हो तो इसके बारे में शिक्षा प्राप्त कर लेनी चाहिये । वरना काम अपनी कामाग्नि में जलाकर भस्म कर देगा । इसका उदाहरण आये दिन घटित होने वाली बलात्कार जैसी घटनायें प्रमुख हैं ।

        अगर कोई स्त्री पुरुष विवाहित है या विवाह बंधन में बंधने वाला है तब तो उसे काम के बारे में ज्ञान अवश्य होना चाहिये । वरना उसका दांपत्य जीवन सुखमय होने की आशा कम ही नजर आती है ।  काम के बारे में किसी भी आयु का प्राणी जान सकता है । काम की शिक्षा प्राप्त करने की न तो कोई आयु है और न ही कोई समय सीमा निर्धारित की गयी है ।

        मैं धन्यवाद देता हूँ महर्षि वात्स्यायन , आचार्य कोक्कोक , महाकवि जयदेव , कवि कल्याण मल्ल , जैसे ऋषि मुनियों , विद्वानों और राजा महाराजाओं को जिन्होंने कामसूत्र , रति रहस्य , रति मंजरी , अनंगरंग ,  जैसी पुस्तकें लिखीं और खजुराहो जैसे मंदिरों का निर्माण किया । इनके द्वारा रचित पुस्तकें और मंदिर मानव के लिये अमूल्य धरोहर हैं । जो कि काम के बारे में सही शिक्षा और दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने की शिक्षा देती हैं ।

        मेरे विचार से कामुक स्त्री - पुरुष वही है जिनके हाव - भाव और बातों से व्यभिचार और कामुकता प्रदर्शित होती हो । लेकिन काम पर बात करने वाले लोग कामुक नहीं हो सकते , क्योंकि काम में अनेक तत्वों का समावेश होता है । अगर कोई कामुकता या कामवासना से युक्त बातें ( पति - पत्नी को छोड़कर ) करता है तो वो अवश्य ही घृणा का पात्र हो सकता है । चाहे वो कोई भी हो ।

        मेरे मन में जो बात बहुत दिनों से उथल पुथल मचा रही थी वो बात मैंने आप लोगों के समक्ष रख दी । अगर आप लोगों को मेरी बात अश्लील या गलत लगे तो मुझे अवश्य बतायें ।

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