शायरी 2

मैं   अपना   इश्क़   उसको   दिखा   नहीं  सकता ,
चाहकर   भी   पास   उसको  बुला  नहीं   सकता ,
कब्ज़ा कर लिया है उसने कुछ इस कदर दिल पर ,
लाख़ भुलाना  चाहूँ  तो उसको भुला नहीं सकता ।

बुलाता   हूँ  जब  कभी   नाज़  के  साथ ,
चली  आती   हो  मेरी  आवाज़ के साथ ,
महक उठता है ज़र्रा ज़र्रा मेरे गुलशन का ,
गाती हो तराने जब किसी साज़ के साथ ।

छत पर तेरे साथ  पतंग से पतंग लड़ाने को  जी
चाहता है ,
बार - बार  तेरी  मोहिनी सूरत  निहारने  को जी
चाहता है ,
बदनाम होकर न रह जाये हमारी मोहब्बत गली
कूचों में ,
मांग में सिंदूर भरकर तुझे अपना बनाने को जी
चाहता है ।

फोन पर ही बात करती रहोगी या मिलने भी आओगी ,
घर पर मम्मी हैं पापा हैं ऐसे बहाने कब तक बनाओगी ,
अगर आ गया किसी दिन ससुर जी से मिलने
के बहाने ,
देखकर उई अम्मा कहते हुए कमरे में अवश्य 
छुप जाओगी ।

प्रेम कुमार मौर्य ... ✍️

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