रूप है तेरा संगमरमर जैसा ( कविता )
रूप है तेरा संगमरमर जैसा
कातिल है तेरी अदा ,
एक बार देखने के बाद
हुआ था मैं तुम पर फ़िदा ,
चाहता हूँ तुम्हें जान से ज्यादा
रहूँगा तेरे साथ सदा ।
मेकअप की तुम्हें नहीं जरूरत
खूबसूरती का हो साक्षात रूप ,
तुम्हारे रंग रूप की तारीफ
करूँ तो करूँ कैसे ?
काम लोक से ' रति '
पृथ्वी पर उतर आयी हो जैसे ।
तेरा हँसना और हँसाना
रूठना मनाना है लाजवाब ,
तुम यथार्थ हो
या रात्रि का सपना ,
सचमुच कर दिया
तुमने दीवाना ।
तुम हो मेरी प्रिय ,
मैं हूँ तुम्हारा ' प्रेम ' ,
अब तो मान जाओ मेरी जान
मैं रखूँगा तुम्हारा ध्यान ,
कभी न तोड़ूँगा अपना वादा
अब नहीं करूँगा ड्रामा ज्यादा ।
✍ प्रेम कुमार लविश
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