रूठने मनाने पर ( कविता )

मुझसे नफरत क्यों करती हो 
किस बात को लेकर रूठी हो ,
कब तक छुपाओगी तुम
मुझसे ही प्यार करती हो ।

थोड़ा ड्रामा दिल में था 
इसका मकसद तुम्हें आजमाना था ,
अच्छा चलो , मैं झूठा 
तुम सच्ची हो ।

कान पकड़कर मांगू सॉरी
अब तो माफी दे दो यार ,
अब तो मान जाओ मेरी जान 
या ऐसे ही करती रहोगी परेशान ।

✍ प्रेम कुमार " लविश "
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मेरा यार है रूठा हुआ , मनाने में वक्त लगेगा ,
वो फूल है मुरझा हुआ खिलखिलाने में वक्त लगेगा

हो गयी हैं कुछ गलतियाँ अंजाने में क्रोधवश मुझसे ,
शूल सी बातों को उसे भुलाने में वक्त लगेगा ।

गहरे हुये होंगे अगर शब्दों से ज़ख़्म उसके सीने में ,
नाज़ुक सा दिल है दिल को मिलाने में वक्त लगेगा ।

सूनी-सूनी हो गयी हैं रंगीनियों से भरी हमारी महफिलें ,
खफ़ा हुए शख़्स को इस बार बुलाने में वक्त लगेगा ।

खुद चुकी हैं खाईयाँ पड़ चुकी हैं रिश्तों में दरारें ,
तर-बतर रूमानी जज्बातों से भरने में वक्त लगेगा ।

आशा की कुछ उम्मीदें जहन में अभी भी हैं बंधीं ,
यार के मायूस मुखड़े पर मुस्कान लाने में वक्त लगेगा ।

✍️ प्रेम कुमार लविश

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