गर्भ में पल रही बेटी की पीड़ा ( कविता )



बेटी   करने   लगी   गर्भ   में   ईश्वर  से   पुकार ,
मुझे  न  भेजो  भेड़ियों  के  बीच  नरक  के द्वार, 
देख  कर  मेरे   जिस्म   और    रंग    रूप   को ,
नोच  खाएंगे  मुझे   और    करेंगें    बलात्कार ।

मनीषा   की  तरह  मेरी   इज्जत  हवसी   लूटेंगे ,
कपड़े   फाड़ेंगे  गिद्धों   की   तरह   मुझे  नोचेंगे ,
किसी  तरह  लुटी  पिटी  जब   घर  को आऊंगी ,
तो तीखे सवालों  को  कैसे  सहन  कर  पाऊंगी ।

फिर भी  समाज के  लोग  चैन  से  जीने  न  देंगें ,
कुलटा   बदचलन    कहकर   चुटकी   मेरी लेंगे ,
कुछ  समय   बाद    जब     घर   से   निकलूंगी ,
हवसी  नजरों  से   देखकर   फिर   से  दबोचेंगें ।

अस्मत लूटकर  निर्भया   की   तरह   मुझे मारेंगे ,
कोर्ट  कचहरी  के   चक्कर   मां   बाप  लगाएंगे ,
फिर  भी  नहीं   होगा   दुष्कर्मियों   को   संतोष ,
तो  मां  बाप  को  धमकी   देकर    ये   डराएंगे ।

हे  मेरे  ईश  !  मुझे  इस   संसार  में    मत भेज ,
दरिंदों से बची तो विवाह के वक्त वर वाले मांगेंगे दहेज ,
अवतरित  हो   गई  अगर  मैं  इस   धरा   पर ,
दहेज के लोभी  मुझे  मारकर  सुलाएंगें  सेज ।

इतनी  पीड़ा  अत्याचार  मैं  सह    ना    सकूंगी ,
रुपए पैसे की खातिर हैवानों  की भेंट मैं चढूंगी ।


 प्रेम कुमार " लविश "
गुमथल , चंदौसी  ( उत्तर प्रदेश )

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