शायरी
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वो भी रुखसारों पर लाली सजाये मंद-मंद मुस्कुराते हैं ,
ये देख हमने भी कह दिया दिल की लगी बुझाने को ,
कहने लगे आप इंतजार कीजिए हम रात को आते हैं ।
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सावन की बारिशों तुम जब कभी धरा पे आया करो ,
उसका तन - बदन छूकर प्रेम सा अहसास कराया करो ,
बहुत दिन हो गये हैं तन्हायी भरी महफिल में रहते रहते ,
कभी तो उसके दिल में मिलन की तड़प जगाया करो ।
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प्रिय तुम जब भी आती हो मुझको बहुत सताती हो ,
दूर रहकर इन गुलाबी अधरों की प्यास बढ़ाती हो
खुशनुमा हो महकने लगता है हर लम्हा हर मौसम ,
'आरिज़-ए-गुल-रंग पर लाली सजाये मुस्कुराती हो ।
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बेहद खूबसूरत लगती हो तुम दुपट्टे को दबाके हँसने
वाली ,
दिलकश अदाएं लगती हैं तुम्हारी बलखाके चलने
वाली ,
काफी समय बीत चुका है तुम्हारी यादों के साथ रहते
रहते ,
अब तो आ जाओ आगोश में दिल के तारों को छेड़ने
वाली ।
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तुमने ही तो छत पर बुलाया था
गोदी में सिर रखकर मुझे सुलाया था ,
जब मम्मी ने पकड़ लिया तो कहती हो
कौन हो तुम और किसने तुम्हें बुलाया था ?
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दिमाग खराब हो चुका है तुम्हारा , मेरे बार बार मनाने से ,
रूठी रहो , मैं भी खुश हो जाऊँगा आसकारा के आने से ।
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छत पर तेरे साथ पतंग से पतंग लड़ाने को जी चाहता है ,
बार - बार तेरी मोहिनी सूरत निहारने को जी चाहता है ,
बदनाम होकर न रह जाये हमारी मोहब्बत गली कूचों में ,
मांग में सिंदूर भरकर तुझे अपना बनाने को जी चाहता है ।
प्रेम कुमार मौर्य ....✍️
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