मां पर मुक्तक
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गांव छोड़कर शहर में वो मुझे जाने नहीं देती ,
फोन करती है तो खाना भी मुझे खाने नहीं देती ,
न जाने से कौन से पुण्य किए होंगे पूर्व जन्म में मैंने ,
तभी तो ममता की छांव से दूर मुझे होने नहीं देती ।
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दिखायी दे गया है मेरा चाँद रात मुझको ,
आ गया बसंत रुत का आनंद रात मुझको ,
किन शब्दों में अदा करूं माँ का शुक्रिया ,
कर गयी ज़िम्मेदारी के प्रति फिक्रमंद रात मुझको ।
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जन्म देने से पहले पेट में माँ ने मेरे हाथ पैरों की
चोट खायी है ,
मुझको इस धरा पर लाने को माँ ने तूफानों से
की लड़ायी है ,
पड़ न जाये कभी किसी बुरी शक्ति के साये की
मुझ पर नजर ,
इसलिए आज माथे पे मेरे माँ ने काली स्याही की
बिंदी लगायी है ।
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