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अनाइसा द्वारा कशिश के पत्र का प्रत्युत्तर ************************************ मेरे सनम मेरी जान , बहुत शैतान हो तुम । पत्र इस तरह फेंका कि सीधे - सीधे मेरे पैरों के पास आकर गिरा । वो तो ठीक था कि मैंने शीघ्रतापूर्वक उठाकर छुपा लिया । अगर पत्र पर भैया की दृष्टि पड़ जाती तो , हो जाता उसी समय अपनी प्रेम कहानी का बंटाधार । शैतान कहीं के ! उल्टी सीधी शरारतें तो बहुत आती हैं तुम्हें । सच बताऊँ तो , मैं तुम्हारी इन्हीं शरारतों पर मर मिटी हूँ । तुम्हारे बिन जीना ' जल बिन मछली ' सा लगने लगा है । सारी रात इधर से उधर , उधर से इधर करवटें बदलती रहती हूँ और जब तुम्हें अपने सम्मुख न पाती हूँ तो छटपटाकर रह जाती हूँ । कभी - कभी तो लगता है कि हम दोनों कदाचित एक दूसरे के लिये ही बने हैं और जन्म जन्मांतर के जीवनसाथी हैं । रही अब मिलने की बात तो मैं भी तुमसे मिलना चाहती हूँ लेकिन संकोचवश कह न सकी । जो दशा तुम्हारी है वही मेरी भी है । इसलिये तुम मंगलवार की प्रात: 4:30 बजे वैशाली उद्यान के पास जो झील है वहीं पर आकर मिलो । हम दोनों वहीं पर अपने - ...
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