घनाक्षरी छंद

चमक   बिखेर  रही , सूरत   है  चाँद  जैसी ,
बिंदिया सजाये  माथे , मोरनी  सी दिखती ।

सागर से  नैना  लगे , कोयल सी बानी लगे ,
होठों पे मुस्कान सजा , पुष्पों सी है  लगती ।

उसके ही पास रहूँ , प्रेम  को  ही  जीता रहूँ ,
जुल्फों   को   लहराकर , इशारे  वो  करती ।

सखियों का दिल जले , कलेजे पे आरी चले ,
' प्रेम ' खिंचा चला आये , ऐसे  वो  संवरती ।

✍️ प्रेम कुमार लविश






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