अभिलाषा मुक्तक
महक सकूँ जिसकी सुगंध से ऐसा मुझको गुलाब चाहिए ,
पढ़ सकूँ अपने गुनाह ऐसी मुझको किताब चाहिए ,
चल पड़ूं जो कभी जाने - अंजाने गुनाहों के रास्तों पर ,
हया का दामन न छोड़ पाऊँ ऐसा मुझको हिजाब चाहिए ।
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चाहत नहीं रही अब दिल में , इश्क़ मोहब्बत करने की ,
फ़िक्र नहीं है महबूबा से , छुप-छुपकर अब मिलने की ,
जान गया हूँ समझ चुका हूँ , हुस्न के इन अफ़सानों को ,
तमन्ना तो बस इतनी है , चाँद तारों के बीच नाम लिखने की ।
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