कशिश और अनाइसा का प्रेम पत्र ( 7 )
------ कशिश द्वारा लिखा गया पत्र ------
प्रिय अनाइसा ,
तुम्हारा पत्र हाथ में आते ही दिल सामान्य गति की अपेक्षा दोगुनी गति से धड़कने लगा तथा हाथ पैरों में कंपन सा महसूस होने लगा था । सच मानो , उस समय मेरी अवस्था ऐसी थी , जैसी कटघरे में खड़े किसी अपराधी की न्यायाधीश के निर्णय सुनाने से पूर्व होती है । स्वयं को सामान्य अवस्था में लाने के लिये एक गिलास ठंडा पानी पिया तब कहीं मेरी धड़कनें सामान्य हुईं और काफी कशमकश से गुजरने के पश्चात पढ़ने के लिये पत्र खोला । पत्र खोलते ही तुम्हारी मोतियों सी लिखावट चमक उठी और उसमें उभरकर आया प्यारी सी मुस्कुराहट लिये तुम्हारा चेहरा , झील सी गहरी नीली आँखें , उलझे - उलझे गेसू और बायें गाल पर छोटा सा तिल , ये सब पत्र में दिखने लगा । प्रसन्नता के मारे मैं फूला न समा रहा था और मन मयूर नृत्य करने लगा । तुमने जिस प्रकार अपनी प्रेम रूपी भावनाओं को शब्दों का रूप दिया है , उससे तो लग रहा है कि तुम मुझे बहुत चाहती हो । अब तो मैं इस पत्र के आधार पर निश्चय ही कह सकता हूँ कि मुझसे अधिक भाग्यशाली इस संसार में कोई और नहीं है ।
पत्र पढ़ने के पश्चात मुझे बीते समय की सभी बातें याद आ गईं कि कैसे और किस प्रकार हमारी नजरें चार हुई थीं । तुम्हें भी अच्छी तरह याद होगा कि मैं उस समय तुम्हारे गाँव में तुम्हारे पड़ोसी अर्थात अपने मित्र विक्रम के यहाँ आया हुआ था और तुम विक्रम के घर रसोई उद्यान से पूजा के लिये कुछ पुष्प लेने आयीं थीं । उस समय मैं तुम्हें 8 वें आश्चर्य की भाँति एकटक देखता ही रह गया , तुम्हारी मनमोहक छवि ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया । सोचा , ये इंद्रलोक की अप्सरा आज राह कैसे भटक गई ? तभी तुमने भी एक नजर मेरी ओर देखा । लेकिन , तुमने चाची जी के पैरों की आहट पाकर निगाहें हटा ली थीं और तुम उसी समय रसोई उद्यान में पुष्प तोड़ने के लिये चली गईं और मैं तुम्हें देखता ही रह गया । फिर अगली बार मिलीं भी तो आइसक्रीम पार्लर में अपनी सखियों के साथ , लेकिन वहाँ भी मैं इच्छा के रहते मन मसोसकर रह गया और तुमसे बात करने का साहस न जुटा सका । डर लगा कि कहीं तुम मुझे गली मोहल्लों के आवारा लडकों जैसा न समझ बैठो ।
5 दिन बीत चुके थे यूँ ही तुम्हें आते जाते देखकर , लेकिन डर के मारे तुमसे बात करने का साहस फिर भी न जुटा सका । समय भी अपनी निर्बाध गति से गुजरने लगा और मैं तुम्हें देख देखकर प्रसन्न होता रहा । फिर एक दिन कक्षा में किसी ने मेरी कॉपी चुरा ली , जिसके चलते मुझे द्वारा से नोट कॉपी बनानी थी । मैं तो परेशान ही हो गया था कॉपी चोरी हो जाने के कारण । मेरी समझ में ही नहीं आ रहा था कि किसकी कॉपी माँगूं और किसकी नहीं । क्योंकि कक्षा में कुछ लोगों की लेखन शैली अच्छी नहीं थी और कुछ की अच्छी थी तो उनके लड़ायी झगड़े के व्यवहार के कारण मेरी कॉपी माँगने हिम्मत नहीं हुई । तब मैंने अपनी समस्या अपने मित्र विक्रम को बतायी तो उसने तुम्हारा नाम सुझाया और बताया कि तुम्हारी लेखन शैली बहुत अच्छी है और तुम कॉपी देने से मना नहीं करोगी । इसी कारण मैंने कागज पर लिखकर तुमसे कॉपी देने का अनुरोध किया और तुमने मुझे कॉपी दे दी । जिसे मुझे कार्य पूरा करने के बाद लौटाना था । 6 दिन बाद अचानक से मुझे युक्ति सूझी कि क्यों न कॉपी के बहाने तुम्हें अपने दिल की बात बता दी जाये और फिर मैंने वही किया जो मेरे दिल ने कहा । शीघ्र ही कागज कलम उठाकर अपनी भावनाओं को पत्र का रूप देने लगा और इस पत्र को लिखकर तुम्हारी कॉपी के बीच में छिपाकर तुम्हें दे दिया । ये मेरा सौभाग्य था कि तुमने मेरा प्रेम प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ।
अब तो बस दिल की एक ही अभिलाषा है , और वो है तुमसे मिलने की । अगर तुम्हारे दिल में भी मिलने की तड़प है तो शीघ्र ही कोई बहाना खोजकर मिलने की कोशिश करो । तुम्हारे बिन जीना मुझे अच्छा नहीं लग रहा । रातों की नींद और दिन का चैन सब छिन सा गया है । पत्र का उत्तर शीघ्र ही देना । अब तो मुझे तुम्हारे प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा है , जिसमें मिलने का वादा होगा ।
तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा में ।
...... तुम्हारा दीवाना कशिश
©️®️ प्रेम कुमार लविश
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