मेरा प्रथम प्रेम पत्र
मेरी सांसों कि मल्लिका ,
तुम्हारी बहुत याद आ रही है । मन कर रहा है कि पंख लगा कर उड़ कर तुम्हारे पास आ जाऊँ । हर पल मन करता है कि तुम्हें देखता रहूँ , तुमसे लिपटा रहूँ , तुम्हें स्पर्श करता रहूँ , तुमसे एकाकार होता रहूँ , तुम्हें अपने में समेट लूँ तन से , मन से , आत्मा से । तुम्हें देखे बिना ऐसा लगता है जैसे किसी देह से उसके प्राण छीन लिये हों , तुम्हें देखकर स्वयं ही मन संतुलित हो जाता है । कदाचित तुम कहोगी कि मैं पागल हूँ । हाँ मैं पागल ही हूँ और पागल ही रहना चाहता हूँ -- तुम्हारे लिये -- तुम्हारे प्यार के लिये -- तुम्हारे प्यार में ।
तुम्हें देखे बिना कोई भी कार्य करने को मन नहीं करता । अगर कोई कार्य करने भी लगूँ तो आँखों के सामने तुम ही नजर आती हो । कहीं जाने को , तुम्हारे सिवा किसी से मिलने को मन नहीं करता । ना जाने तुम ने मुझ पर कौन सा जादू कर दिया है ----
मैं किस हद तक तुम से जुड़ गया हूँ इसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकतीं । हर क्षण , हर लम्हा तुम्हारे पास रहने को , तुम्हें देखने को जी करता है ।
प्रेमियों ने कहा है -- प्यार करने के बाद कोई अभिलाषा शेष नहीं रह जाती । प्रेम व्यक्ति को महान बनाता है , उसे उठाता है , उसे अपना सब कुछ देता है , अपने लिए कुछ भी बाकी नहीं रखता , प्रेमिका के सुख में स्वयं को सुखी मानता है । प्रेमिका के तनिक से दुःख में प्रेमी स्वयं को मिटाकर भी प्रेमिका के दुःख को दूर करने की हिम्मत रखता है ।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि मेरी जान का दुःख हर लो , चाहे मुझे कितना ही दुःख दे दो । भगवान ऐसी प्रार्थना को सुनता है , क्योंकि इस प्रार्थना में स्वार्थ नहीं है । तुम्हारे ऊपर जरा सी परेशानी या दुःख को देखकर मैं अपना संतुलन खो बैठता हूं । तुम्हें हँसता हुआ और खुश देखना चाहता हूँ । तुम्हारे प्यार की दीवानगी , एक पागलपन मेरे ऊपर हर पल छाया रहता है । कोई लम्हा ऐसा नहीं होता जब तुम मेरी यादों में और मेरे ख्यालों में ना रहती हो । तुम्हारा साया , तुम्हारी यादें हर वक्त मेरे साथ रहती है ।
इन दिनों मेरी क्या दशा हो गई है तुम नहीं सोच पाओगी , मेरे सीने में हमेशा दर्द रहता है... तुम्हारे प्यार का दर्द । दवा खाने पर भी कोई असर नहीं । दवा तो तन को लगती है , मन को नहीं । मेरे दर्द की दवा केवल तुम हो । मनुष्य तन के सहारे नहीं मन के सहारे जिंदा रहता है । मन से मन मिल जाए तो सब कुछ मिल जाता है । नहीं तो एक वीरानगी , एक दीवानगी , एक पागलपन , एक उदासी सी छायी रहती है ।
मैंने अपनी सभी कोमल भावनाओं को , अपने प्यार को , अपने मन को , अपने दिल को पूर्ण रूप से तुम्हारे अंदर केंद्रित कर दिया है ---
सब कुछ तुम्हारा है , अपने लिए कुछ भी बाकी नहीं रखा है । मैं पूर्ण रूप से तुम्हारा हूँ । अब आगे तुम्हारी इच्छा जैसे तुम रखना चाहो...वैसे रख सकती हो । मेरा सब कुछ तुम्हारा है । पत्र समाप्त कर रहा हूँ ।
- - - - तुम्हारा दीवाना
©️®️ प्रेम कुमार लविश
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